संत आसाराम बापू - हिन्दू आस्था पर अभी तक का सबसे बड़ा प्रहार ??

संत आसाराम बापू के लिए कैसी उतावली मीडिया? ट्रायल कोर्ट में पेश हुए बयानों व तथ्यों की सच्चाई को ताक पर रखकर टीवी की गरमागरम बहसों में मान ही लिया है कि गवाहों की हत्या में संत आसाराम बापू का ही हाथ है और वे सच्चाई बाहर आने नहीं देना चाहते.

आसाराम बापू को कसूरवार ठहराकर और उनकी इस इमेज से रेटिंग बटोरने के प्रयास में प्राय टीवी चैनल्स और प्रिंट मीडिया ऑन-रिकॉर्ड तथ्यों को नजरअंदाज कर और मुद्दे के सभी पहलुओं को बिना पड़ताल कर या फिर एक प्रकार से बनाये हुए खास पहलु को तूल देकर गवाहों के मामलों पर कवरेज कर रहे हैं.

लेकिन क्या है गवाहों पर हमले का सच ?

आसाराम बापू के केस की सुनवाई जैसे जैसे आगे बढ़ रही है कि आये दिन किसी गवाह के मारे जाने या फिर गायब होने की खबर आ जाती है. अब एक और गवाह राहुल सचान के लापता होने की खबर है. लेकिन इन सब के बीच केस के गवाह कौन-कौन हैं, उनमें से कौन अहम हैं और कौन नहीं, पुलिस ने उन्हें किन कारणों से केस में नामजद किया है, इन सब के बारे में जानना बेहद जरूरी है.

लेकिन संत आसाराम बापू के खिलाफ वर्तमान प्रकरण और पिछले मामलों में गवाह चुने जाने की पृष्ठभूमि को यदि खंगाला जाये तो एक ताना-बाना बुना नजर आता है.
 

 

जोधपुर में अगस्त 2013 में शिकायतकर्ता को नाबालिग ठहराकर जैसे ही यौनशोषण का मामला दर्ज हुआ वैसे ही आसाराम बापू की संस्था से टूटे हुए कथित पूर्व सेवादारों समेत विरोधी एक्टिविस्ट्स की फौज दबाव बनाने के लिए एकाएक टूट पड़ी. परिवर्तित नामों और ढके हुए चहरों के कई महिलाओं को बुलवाकर पीड़ित बताने की भरपूर कोशिश की गयी. पूर्व सेवादारों में शुमार अमृत प्रजापति, राहुल सचान, महेंद्र चावला आदि ने तमाम तरीके के मनगढ़ंत बयान कि बापू को अफीम के सेवन की लत है,आसाराम बापू के आश्रमों में यौनाचार होता है, महिलाओं को भीड़ में से टोर्च के रोशनी से चुना जाता है, बहला-फुसला कर बंधक बनाकर रखा जाता है, आदि-आदि न्यूज-चैनल्स द्वारा खूब चलाकर छवि ख़राब करने का माहौल तैयार किया गया.

संत आसाराम बापू केस में गवाहों के संग घटित घटनाक्रम –

  • 1. सूरत की दो बहनों द्वारा लगाये गए आरोपों के मामले में गवाह बने आश्रम के पूर्व वैद्य अमृत प्रजापति पर 23 मई 2014 को गुजरात के राजकोट में दो अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हमला किया. इसके दो हफ्ते बाद हॉस्पिटल में अमृत प्रजापति की मौत हो गयी. यह ऐसा मौका था जब आसाराम बापू की जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगी हुई थी और उसकी सुनवाई जारी थी. विरोधियों ने गवाहों पर हमले होने के मुद्दे को कोर्ट में खूब भुनाया और नतीजन बापू की याचिका 3 जुलाई 2014 को इसी आधार पर ख़ारिज कर दी गयी.
  • 2. सूरत केस के एक और गवाह अखिल गुप्ता की मुज्ज्फरनगर में 11 जनवरी 2015 की रात में दुकान से लौटते हुए बाईक सवार हमलावरों ने गोली फायर कर हत्या कर दी. पूर्व में बापू के निजी कुक रह चुके अखिल की हत्या पर बापू भी बहुत क्षुब्ध थे. मामला अभी सीबीआई के हवाले है. लेकिन गौर करने की बात यह है कि उन दिनों आसाराम बापू के बेटे नारायण साईं की जमानत याचिका पर गुजरात हाईकोर्ट में सुनवाई होने वाली थी. दूसरी तरफ सरकारी गवाह अखिल गुप्ता केस से अपना बयान वापस लेना चाह रहा था.   
  • 3. 13 फरवरी 2015 को राहुल सचान उर्फ़ राहुल शर्मा उर्फ़ लैपटॉप बाबा नामक एक गवाह पर जोधपुर कोर्ट में पेशी से निकलते वक्त एक अज्ञात शख्स ने चाकू से हमला किया. राहुल सचान को चोंटे आयीं हालाँकि पुलिस ने उस शख्स को गिरफ्तार भी किया और उसे बापू से सम्बंधित ठहराने की कोशिश भी की. गौरतलब है कि राहुल सचान नाम का यह शख्स कई आपराधिक मामलों में लिप्त रहा है और सन 2011 में मुंबई पुलिस ने एक महिला का उत्पीडन करने के लिए गिरफ्तार भी किया था. अब इसी गवाह के लखनऊ से अचानक गायब होने की है.
  • 4. जोधपुर और सूरत प्रकरण में गवाह महेंद्र चावला पर 13 मई 2015 को पानीपत में जानलेवा हमला हुआ. महेंद्र चावला की जान बच गयी. महीनों पहले कोर्ट में पेश होकर अपनी गवाही दे चुके महेंद्र चावला पर अनायास ही हमला होना एक सामान्य बात तो कतई नहीं है. 
  • 5. जोधपुर प्रकरण में सुधा पाठक नामक महिला जो तफ्तीश के दौरान बापू के विरोध में बयान दर्ज करा चुकी थी, एक लम्बे अरसे से कोर्ट में पेश नहीं हो रही थी. आरोपित घटना से सीधे सम्बन्ध न होने के बावजूद भी  सुधा पाठक को अभियोजन पक्ष की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने एक क्रिटिकल गवाह घोषित किया था. उन दिनों अभियोजन पक्ष इस गवाह की पेशी ना करवाकर अदालती कार्यवाही को लम्बा खींचने का पैंतरा अपना रहे थे जिससे सुप्रीम कोर्ट की शर्त के मुताबिक छह क्रिटिकल गवाहों की गवाही पूरी ना होने तक जमानत के लिए विचार नहीं किया जा सकता था. लेकिन फिर बीजेपी नेता और न्यायविद् डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सेशन कोर्ट में जमानत याचिका भी लगायी जो इसी आधार पर ख़ारिज कर दी गयी. आखिरकार सुधा पाठक को 1 जुलाई 2015 को कोर्ट में पेश किया गया जहां सुधा अपने पुलिस को दर्ज कराये हुए बयानों से मुकर गयी और स्पष्ट तौर पर आश्रम में किसी भी प्रकार की यौनाचार की गतिविधियाँ होने से इंकार कर दिया. उपरोक्त घटना अभियोजन पक्ष के लिए उनके आरोपों को धक्का पहुचने वाली रही.
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  • 6. अदालत को कार्यवाही में आसाराम बापू के पक्ष में इस सकारात्मक बदलाव के मौके पर अचानक एक और गवाह कृपाल सिंह की उ. प्र. के शाहजहांपुर में दो अज्ञात बाईक सवारों ने 10 जुलाई 2015 को गोली मारकर हत्या कर दी. कृपाल सिंह केस के एक सेकेंडरी गवाह के तौर पर नामजद थे जिन्हें कानूनन एक तरीके से शिकायकर्ता लड़की के परिवार की पृष्ठभूमि को प्रमाणिक आंकने के लिए रखा गया था. कृपाल सिंह की हत्या गवाही देने के 11 महीने के बाद हुई और गवाही जो कि बापू के पक्ष में रही, यह सब एक बड़ा सवाल खड़ा करने वाला है.  
गवाहों पर दु: खद हमलों के ऊपर आसाराम बापू और उनके अनुयायियों का क्या कहना है ?
कोर्टरूम के बाहर निकलते यथा समय दिए गए बयानों में आसाराम बापू इन गवाहों पर हमलों की इन दुख:द घटनाओं से काफी आहत दिखे हैं और स्पष्ट तौर पर निंदा की है. उनके अनुयायी भी इन घिनौनी वारदातों की कड़ी भत्सर्ना करते हैं. साथ ही न्यायविद् डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी और संस्था की प्रवक्ता नीलम दुबे भी इन घटनाओं की गहन जाँच के लिए उच्च-स्तरीय जाँच के लिए मांग भी कर चुके हैं. आसाराम बापू और संस्था की तरफ से जोधपुर सत्र न्यायालय में  दिसंबर 2014 में अर्जी लगाकर लम्बे समय से गवाहों को सुरक्षा और उनकी सीसीटीवी के जरिये सर्विलेंस की मांग भी करते रहे हैं. बचाव पक्ष का कहना है कि एक तरीके से गवाहों की हत्या होना उनके लिए केस को कमजोर करने जैसा है तो वे ऐसा घिनौना और आत्मघाती कदम क्यूँ उठाएंगे?
 
क्या कोई रैकेट सक्रिय है इन हत्याओं को नियोजित करने के लिए ?
गवाहों पर हमले के बारे में मीडिया भले ही अनेक कयास लगाकर आसाराम बापू को जिम्मेदार ठहराने को दर्शाता रहा है और पुलिस भी दबाब में उनकी संस्थाओं के लोगों को गिरफ्तार कर उन्हें टॉर्चर कर जबरन बापू का नाम उगलवाने की कोशिश करती रही है. जिस तरीके से केस में एक संदिग्ध ऍनजीओ का होना, धारा 164 के बयानों का लीक होना,  शिकायतकर्ता की आयु बालिग होने के दस्तावेजों का निकलकर आना कौतूहलपूर्ण है, इन सबके मद्देनजर इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि साजिश की इस बिसात पर गवाहों को मोहरे रख कर चाल कोई और ही चल रहा है.

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